Thursday, July 16, 2009

हंसते हुए मेरा अकेलापन-1

मलयज की डायरी की कुछ पंक्तियाँ...............

"सुरक्षा डायरी में भी नहीं|वहां सिर्फ पलायन है|सुरक्षा अगर कहीं हो सकती है,तो बाहर सूरज की रोशनी में,अँधेरे में नहीं|अँधेरे में सिर्फ छिपा जा सकता है,एक-एक पल के धुकधुकी के साथ|सुरक्षा चुनौती को झेलने में ही है,लड़ने में, पिसने में और खटने में|बचने में नहीं,अपने को सेने में नहीं|"

"डायरी मेरे लिए दहकता हुआ सा जंगल हो,एक तठस्त घोंसला नहीं कि जिसमे अपने को घुसेड जब चाहूँ पड़ रहूँ| डायरी मेरे कर्म कि साक्षी हो,मेरे संघर्ष कि प्रवक्ता हो|मेरी सुरक्षा डायरी के कोरे पृष्ठों पर अंकित शब्दों में नहीं,उन पर जलती आग के बीच हो|"

Wednesday, June 17, 2009

एहसास

मै उठा
आगे बढा
खुद को हल्का पा
ठहर गया
मुड कर देखा तो
खुद को वहीँ अकेला बैठा पाया
जहाँ से उठा था
मै देख रहा था खुद को
उन्हीं आँखों से
जो मुझे देख गीलीं हो रही थी

डायरी

ज़िन्दगी छोटे छोटे कागजों की तरह लगी
जब मैंने अपनी डायरी खोली
उसमे रखे कई छोटे बड़े पन्ने
मेज़ पर बिखर गए
जो खुद में
कई एहसासों को
दबाये पड़े थे
जिन्हें कभी मैंने
उनपर लिखा था और
मोड़ कर
डायरी के बीचों बीच रख दिया था
उनका अस्तित्व
मेरी भावनाओं को सँभालने के लिए ही हो शायद
उन मुडे तुडे कागजों को
खोलने पर मैंने
अपने आपको कई हिस्सों में बटा पाया

Saturday, June 13, 2009

शहर

शहर मैंने तुम्हे देखा है
तुम्हे महसूस किया है
शायद औरों से ज्यादा
क्योंकि रगों की तरह फैली तुम्हारी गलिओं में
मैंने ही खूं बन तुम्हारे हरेक मंज़र का एहसास किया है
तभी तो मैंने तुम्हे करीब से देखा है
शहर तुम मुझे भूलोगे तो नही
कुछ सालों के बाद
जब मै आऊंगा कभी
उन्ही पैरों की आवाज़ का एहसास लिए
जो छोड़ आया था कई जगहों पर
इस उम्मीद से की
आज भी तुम उन आवाजों को संभाले होगे
उनके उसी अस्तित्व के साथ |.

Thursday, May 28, 2009

ब्रह्म की तरह संगीत भी व्यक्त और अव्यक्त है

हर की आवाजाही के बीच वह स्थान भौतिकता से परे एक भरपूर आत्मिक शान्ति और सुकून देता नज़र आया|यह अनुभव संस्कारधानी भोपाल में हाल ही बने ख्याल गायन केंद्र का है|मेरी ख्याल को समझने की उत्सुकता ने केंद्र के आचार्य मुकुल शिवपुत्र के समीप मुझे ला खडा किया|मद्धम रेकोर्ड के धुन पर रियाज़ में खोये हुए मुकुल जी को यूहीं सम्पूर्णता की परिधि में परिभाषित नहीं किया जा सकता वह आज भी अपने को रचाने बनाने की प्रक्रिया में निरंतर लगे हुए है|उनका पूरा जीवन एक सृजनात्मक यात्रा है जो की उनके बचपन से अभी तक के वक़्त में स्थिर न होकर गतिमान रही है |एक स्वर प्रधान गायन शैली ख्याल को समझने की उत्सुकता ने मुझे मुकुल जी के समीप कुछ सवालों के साथ खडा किया|पेश है उस बातचीत के अंश | 

संगीत का आध्यात्मिक पहलू क्या है |एकांत और अकेलेपन की संगीत में क्या भूमिका है? 
संगीत की सृष्टि नाद से हुई है |नाद ब्रह्म है और मनुष्य का अंतःकरण ब्रह्मस्वरूप है|अतः संगीत का सीधा सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है|संगीत भी उसी ब्रह्म की तरह व्यक्त और अव्यक्त में बटा रहता है|संगीत निष्काम पूर्वक किया गया कार्य है|उसी तरह जैसे किसी प्रेमी को अपनी प्रेमिका से बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करना चहिये|संगीत में अकेलापन और एकांत दोनों की ही जरुरत है|संतुलन जरुरी है| 
ख्याल के अनुष्ठान में कभी कभार टप्पा और तराना जोड़ दिया जाता है|क्या इससे ख्याल की शुद्धता पर असर नहीं पड़ता? 
बिलकुल नहीं,आपने उसे शुद्ध जब मान ही लिया तो किसी अन्य विधि के उसमे जुड़ने से वह तो और परिष्कृत होगी|कोई असर नहीं पड़ता उसकी शुद्धता पर| 
ख्याल में खुसरो और नियामत खान के योगदान पर आपके विचार क्या है? 
खुसरो अत्यधिक प्रभावशाली संगीतकार है उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विभिन्न पक्षो को व्यवस्थित किया तभी तो उन्हें ख्याल के जनक के रूप में हम देखते है|नियामत खान ने आधुनिक ख्याल को शास्त्रीयता प्रदान की|ख्याल गायन के चार घराने है जिनमे ग्वालिअर घराने की महत्वपूर्ण भूमिका है| 
कार्नेटिक मेलाकार्टा और थाट क्या दोनों एक ही है? 
यह दोनों ग्रुप ऑफ़ नोड्स है|पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी जो काफी विद्वान थे ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में दस थाट बताये भैरवी, भैरव,कल्याण,मारवा,आदि दूसरी तरफ कार्नेटिक में यह बहतर बताये गए है|इनका संगीत में लक्ष्य मापने का है| 
ख्याल गायकी में अब सारंगी की कमी दिखाती है,क्या किसी विकल्प को तलाशना होगा? 
हां यह सही है दरअसल अच्छा सारंगी बजाने वाला कोई दिखता नहीं है|विकल्प को बेशक गंभीरता से तलाशना होगा|
काफी वक़्त बीत गए अब पिता को किस तरह याद करते है? 
(थोड़े भावुक होकर) वह मेरी चाहत थे |मज़बूरी भी थे और है भी|उन्ही से हम जीते है और उन्ही से हारे भी वही मेरी चाहत थे |उन्ही को फ़ोलो करता हु उन्ही को एड्रेस भी |एक मूक अनुमोदन अपेक्षित था उनसे|मै यही समझता हू वह दूसरे कमरे में आज भी बैठे मुझे देख रहे है,पर प्रत्यक्ष मिलना नहीं चाहते |He does not literally want to meet but he needs.हम आज भी उनकी वर्ष्गांठ मानते है | 

बातचीत के अंत में उन्होंने कृष्णा का पारंपरिक गायन "जाओ वही तुम शाम हो,जहाँ जगे सारी रैन....तथा "यमुना किनारे मेरो गाँव सावरे रह जइयो....सुनाया |

Sunday, May 10, 2009

मेरी प्यारी माँ के लिए...........


मेरी प्यारी माँ के लिए | जिसे बेशक शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता बल्कि शब्द तो उससे व्यक्त होते है| 

हर शांत है 
हो गए है या 
कर दिए गए है 
इनमे अब वह बात नहीं 
जिनसे वह पहचाने जाते थे 
उनकी गलियों में कभी हम दौड़ा करते थे 
लबरेज़ उमंगों के साथ 
शाम होते ही इंतज़ार रहती थी 
बिज़ली के जाने की 
ताकि निकल पड़े यूहीं 
भटकने के लिए 
उन अँधेरी गलिओं में 
पर अचानक ठहर जाते थे कदम 
गली के मोड़ पर 
मानों आगे एक नई दुनिया थी
खुद-ब-खुद कदम पीछे की ओर आते 
और जबरन खीच लाते माँ के पास 
बस माँ की गोद से गली के मोड़ तक 
शायद 
मेरी एक अपनी दुनिया थी|

Saturday, May 9, 2009

त्योहार के बाद का यह सन्नाटा कब तक रहेगा.........


न जाने कब से वह कोने में चुपचाप सा खडा अपनी निर्दोष व आशान्वित आँखों से हमाम की नंगी हकीक़त देख रहा है |उसकी आँखे रह रह कर लाल भी होती है पर असुरक्षा का बोध होते ही वह झुक जाती है |वह इस आशा में है कि लोकतंत्र के इस महासमर में उसकी कई वर्षों से दबी जरूरते कुछ पूरी होंगी,क्या वाकई होंगी?क्या वाकई "अंग्रेजी शिक्षा और कंप्युटर शिक्षा "को हटाने ,राम मंदिर फिर से बनवाने ,बोफोर्स के घोटाले को पर्दाफाश करने , स्विस बैंक में जमा राशि को भारत लाने जैसे मुद्दों की वचनबद्धता के साथ कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप तथा जातीय समीकरण की राजनीति के बीच उसकी जरूरतों को जगह या तव्ज्जो मिल पाएगी?यह तो वक़्त ही साफ़ करेगा |खैर, यह उसकी नासमझी और पागलपन है,उसे इतना भी नहीं मालूम की वह कोने में है, कोने में ही पड़े रहने के लिए |हाशिये पर खड़े रहने वाले लोग हाशिये से कब बाहर आये है?वह आ भी नहीं सकते क्योंकि बाहर खड़े ठेकेदारों को उनकी ज़रूरत पड़ती है हर पांच वर्षों में ढोल नगाडे के साथ उनके पास पहुच कर उन्हें यह एहसास दिलाने की कि"मैं हूँ ना" इस जालिम दुनिया में तुम्हारे दुःख को बांटने के लिए ,तुम्हारे हित को ध्यान में रखने के लिए,तुम्हे छ्त,भोजन,कपडा देने के लिए|यह विचित्र विडंबना ही तो है कि २१ वीं शताब्दी में भी यह देश खुद को सामंतवाद के मजबूत बाहुपाश से निकाल नहीं पाया है|भला यह हो भी क्यों नहीं भारत जैसे सच्चे लोकतांत्रिक देश कि पहली ज़रूरत है समाज में व्याप्त विषमता को बने रहने देना तभी तो उन सामाजिक ठेकेदारों कि दुकानें चलेंगी |सभी सामान ही हो जायेंगे तब उन्हें सुनेगा कौन ?इसलिए मै बोलता हूँ उसे सुनो, चुपचाप|मैं केवल बोलता हूँ |तुम्हारी तासीर केवल सुनने की है| उस पर अमल करने कि है|चुपचाप सुनों| सवाल मत करो| यह अधिकार मैंने तुम्हे अभी दिया नहीं है| तभी तो वह खडा है, काफी देर से वहां चुपचाप, पता नहीं कब तक वह वहां और रहेगा| उसकी आशाएं है, वह रहेंगी ,उसकी अपेक्षायेँ भी है, वह भी रहेंगी,यूहीं शास्वत,जबतक इन सारे सवालों का ठोस व तर्कपूर्ण जवाब उसके बीच नहीं पहुचता|  
"हुई मुद्दत के गालिब मर गया फिर भी याद आता है वह हरेक बात पर कहना की यूँ होता तो क्या होता"|